महाशिवरात्रि पर्व-
महाशिवरात्रि प्रमुख त्योहार में से एक है। यह भगवान शिव के पूजन का सबसे बड़ा पर्व भी है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। इस पर्व में भोलेनाथ की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। भोलेनाथ अपने भक्तों को इस दिन प्रसन्न होकर मनचाहा वरदान देते हैं। अनुष्ठान को लेकर शिवालयों में जोर-शोर से तैयारी की जा रही है। आपको बता दें कि महाशिवरात्रि भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन का पर्व माना जाता है। इस दिन विशेष पूजा-अर्चना से प्रसन्न होकर भोलेनाथ सारी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव ने कैलाश पर्वत पर माता पार्वती से विवाह किया था। इसलिए यह पर्व बहुत खास है।
महाशिवरात्रि व्रत के नियम-
महाशिवरात्रि व्रत में रात्रि जागरण का खास महत्व है, इसलिए इस व्रत में रात को सोना नहीं चाहिए (जागरण करना चाहिए) और भगवान के भजन करने चाहिए। भोलेनाथ की घर पर या मंदिर में जाकर कई चीजों से पूजा अर्चना करनी चाहिए। भोलेनाथ को चंदन से तिलक, बेर, शमी के पत्ते, बेलपत्र और धतूरा भी भोलेनाथ को अर्पित करना चाहिए। व्रत के समय काले कपड़े न पहनना चाहिए इसलिए व्रत में काले रंग के कपड़ों की बजाय लाल, हरा, पीला पहन सकते हैं। विचारों और शरीर से शुद्ध रहना चाहिए और व्रत में नमक का सेवन नहीं किया जाता है। इस व्रत में एक समय फलाहार कर सकते हैं।
महाशिवरात्रि की व्रत कथा-
प्राचीन काल में एक नगर में एक सेठ और सेठानी रहते थे। उनके पास अन्न-धन की कोई कमी नही थी, पर वह लोग अपने जीवन में क़ोई भी दान नही करते थे। उनके जीवन में उन्होंने कभी भी कोई धर्म का काम नही किया है, उन्होंने जीवन में कभी भी किसी को भिक्षा नही दी, उनके यहां कोई खानेवाला भी नही था, कोई संतान नहीं थी।
जिस जगह पर सेठ की हवेली थी, वहां पर एक पीपल का वृक्ष था और उस वृक्ष पर एक सुंदर-सी चिड़िया रहती थी। वह वहां घोंसला बना रखी थी। चिड़िया के दो छोटे - छोटे बच्चे थे। चिड़िया रोज नगर में दाना पानी चुगने जाती थी, चुगने के बाद वापस घर में आती और अपने बच्चों को दाना खिलाती।
रोज उस सेठ के घर भी जाया करती थी; पर कुछ नहीं मिलता था, इसलिए चिड़िया वहां से आगे चली जाती। चिड़िया अपने मन में सोचती रहती थी कि पूरे नगर में सबसे बड़ी हवेली इनकी है और बहुत धनी व्यक्ति भी है; फिर भी ये कभी किसी को कोई दान नहीं देता, कभी कोई भी भिक्षा नही देता, भिक्षुक को दान नहीं डालता, कभी मंदिर में सहयोग नहीं करता, कभी किसी असहाय व्यक्ति की सहायता नहीं करता, पशु की सहायता नहीं करता, ना ही कभी कोई पशु को दाना डालता; कि सेठ बड़ा कंजूस है।
एक दिन चिड़िया सुबह का वक्त अपने घोंसले से उड़कर सेठ की हवेली में जाकर बैठी; तभी सेठ और सेठानी आपस में बात करते है।
सेठानी, सेठ से कहती है "सेठ जी, हमारे पास सब कुछ है, इतनी धन-दौलत है, इतनी जमीन है, पूरे नगर वाले हमें नगर सेठ कहते है, हमारे पास धन की कोई कमी नहीं है, लेकिन हम इस धन का क्या करें जब कोई वारिस नहीं है, कोई पुत्र नहीं है?"
तब सेठ अपनी सेठानी से कहता है कि "सेठानी इसमें हमारा क्या कसूर है, जब हमारा नसीब ही ऐसा है, हो सकता है हमारे नसीब में पुत्र प्राप्ति नहीं है, पुत्र धन की प्राप्ति नहीं है।"
सेठ और कहता है; "जब तक जिएंगे, तब तक इस धन को खा लेंगे। उसके बाद जिसके नसीब में होगा वह इस संपत्ति को खाएगा।"
दोनों पति-पत्नी इस तरह की बातें करते है, और वह चिड़िया सेठ और सेठानी की पूरी बात सुन के वहां से उड़कर चली जाती है और दाना चुगने के बाद वापस अपने घोंसले में चली जाती है।
अब चिड़िया सेठ के घर जाने लगी और सेठ और सेठानी की पूरी बातें सुनने लगी।
सेठ की जो घरवाली थी 'सेठानी'; वह अच्छी स्वभाव की थी, उसके दिल में दया धर्म भी था। जब सेठानी रोज उस चिड़िया को देखती थी, तब उसे कुछ दाना देती थी। फिर उसे उस चिड़िया से धीरे-धीरे लगाव हो जाता है। अब सेठानी उस चिड़िया को सेठ से छुप छुप कर दाने डालती, वह चिड़िया दाने चुगती।
ऐसे काफी दिन निकल जाते हैं, एक दिन चिड़िया मन में सोचने लगती है कि सेठानी बहुत अच्छी है और मुझे दाने भी खिलाती है लेकिन उसके घर में पुत्र नहीं है। वह चिड़िया अपने मन में सोचने लगती है की "सेठानी को पुत्र हो, ऐसा क्या किया जाए कि सेठानी को पुत्र की प्राप्ति हो"। चिड़िया सोचने लगती है "जब एक औरत मां नहीं बनती है तब उसका दुःख एक औरत ही समझ सकती है। औरत का जीवन तभी सफल होता है जब वह मां बनती है। एक औरत को सबसे बड़ा सुख तब मिलता है जब वह मां होती है।" यही सोचकर चिड़िया बड़ी दुःखी होती है; वह कहती है की "सेठानी बड़ी सीधी-सादी है रोज मुझे दाना खिलाती है। मन में आता है कि क्यों ना मैं देवों का देव महादेव पास पहुंचू और इस सेठ और सेठानी की बात करूं, इनकी अर्जी लगाऊं।"
यही सोच कर चिड़िया अपने पति जीरा से कहती है "पिया जी, मैं कुछ दिनों के लिए जा रही हूं, मेरे बच्चों का ख्याल रखना उनको समय पर दाना पानी खिलाना।"
यही कह कर वह चिड़िया हौसले से उड़ान भरती है, चिड़िया उड़ती हुई जाती है, रात दिन उड़ती है, विचरण करती है, भूखी प्यासी उड़ती है और उड़ती-उड़ती; अंततः वह कैलाश पहुंच जाती है, जहां पर देवों का देव महादेव और माता पार्वती थे। चिड़िया उड़ती हुई जाकर माता के चरणों में गिर जाती हैं और मां पार्वती के चरणों में बैठती है और वही बेहोश हो जाती है।
मां जगदंबा 'पार्वती', चिड़िया को हाथों में उठा लेती है; और चिड़िया को होश में लाती है। और चिड़िया से कहती है कि "चिड़िया तुम कहां से आई हो, हे पुत्री! तुम बड़ी परेशान हो रही हो।"
तब चिड़िया मां पार्वती से कहती हैं "मैया! मैं बड़ी दुःखी हूं और बड़ी दूर से आई हूं। मैं अपने दुख के लिए दुःखी नहीं हूं; किसी और के दुख के लिए बड़ी दुखी हूं।
तब मां पार्वती कहती है कि "हे पुत्री! मुझे सब कुछ स्पष्ट करके बताओ क्या है? खुल के बताइए।
तब चिड़िया सब कुछ कह देती है "हे मैया! जहां में रहती हूं, वहां सेठ और सेठानी रहती है। उनके कोई पुत्र नहीं है और वह बड़ी दुःखी है और वह सेठानी, मैया, बड़ी भोली है उनको एक पुत्र दे दीजिए।" चिड़िया इतनी बार-बार बोलती "सेठ सेठानी को एक पुत्र दे दीजिए।" इतनी बात मां पार्वती से कहती है और फिर से वह बेहोश हो जाती है। मां पार्वती फिर से उस चिड़िया को होश में लाने की कोशिश करती है। काफी देर बाद वह चिड़िया फिर से होश में आती है तब मां पार्वती उस चिड़िया को कुछ दाना पानी खिलाती है और कहती है; "हे पुत्री! तुम चिंता ना करो, थोड़ी देर में महादेव अपनी समाधि से उठेंगे। तब हम उनसे इस बारे में बात करेंगे।"
उसके थोड़ी देर बाद महादेव अपनी समाधि से उठते हैं।
मां पार्वती चिड़िया को हाथ में उठाकर महादेव के सामने ले जाती है और महादेव से कहती है "प्रभु! 'फला नगर' में सेठ और सेठानी रहती है। क्या उनके नसीब में संतान है कि नहीं? देखिए तो।
महादेव ध्यान लगाकर देखते हैं और कहते हैं "हे पार्वती! उनके नसीब में कोई पुत्र नहीं है।"
पार्वती कहां की है "हे प्रभु! यदि उनके नसीब में पुत्र नहीं है तो आप उनको पुत्र दे। उनको पुत्र देना पड़ेगा।
लेकिन महादेव कहते हैं कि "हे पार्वती! तुम जिद क्यों करती हो? उनके नसीब में कोई पुत्र नहीं है तो में उनको पुत्र कैसे दे सकता हूं?
लेकिन मां पार्वती जिद करती है और कहती है कि "ये चिड़िया बहुत दूर से आई है और यह आशा करती है हम इसकी सहायता करेंगे। यही आशा से भूखी प्यासी उड़ती हुई इतनी दूर से आई है। आप इसको खाली हाथ नहीं भेज सकते।"
मां पार्वती के इतनी बार सुनने की बाद महादेव कहते हैं कि "ठीक है पार्वती! तुम हर बार ज़िद करती हो और तुम्हारी हर ज़िद को मुझे पूरा भी करना पड़ता है। ठीक है! तुम जिद करती हो तो हम सेठ और सेठानी को पुत्र देंगे।"
"लेकिन" महादेव और कहते हैं तुम चिड़िया से कहो "सेठ और सेठानी कोई दान धर्म नहीं करते हैं। कोई पुण्य का काम नहीं करते हैं, कोई पवित्र शास्त्र नहीं पढ़ते हैं, कोई ज्ञान पुराण नहीं पढ़ते हैं, किसी को भीख नहीं देते हैं, किसी की मदद नहीं करते हैं। ऐसे नास्तिक लोग हैं। अगर नास्तिक से स्वास्तिक होने लगे तो उनको एक पुत्र की प्राप्ति होगी। पूछ लो। हम देंगे, लेकिन उनको दान-धरम भी करना पड़ेगा, मंदिर में भी जाना पड़ेगा, भजन भी गाना पड़ेगा, पूजा-पाठ करना पड़ेगा, शिवरात्रि का व्रत भी करना पड़ेगा, तभी उनको पुत्र की प्राप्ति होगी।
अब वह चिड़िया कहती है कि "हे प्रभु! मैं, मेरी तरफ से पूरी कोशिश करूंगी कि सेठ और सेठानी; मंदिर भी जाए, पूजा पाठ करें, दान दक्षिणा भी करें, मैं अपनी तरफ से पूरा कोशिश करूंगी।"
तब महादेव कहते हैं कि "तथास्तु! अब वह चिड़िया वहां से महादेव और मां पार्वती को प्रणाम करके, वहां से उड़ान भरती हुई अपने घोंसले में आ जाती है।
उसके 9 महीने बाद; सेठानी को, एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति होती है। सेठ और सेठानी बड़े सुख-खुशी से अपने पुत्र की परवरिश करते हैं। चिड़िया जी बड़ी खुशी होती है। चिड़िया फूली नहीं समाती है कि उसकी मेहनत सफल हो गई है। चिड़िया भी अपनी मेहनत का फल देखकर बड़ी खुश है बड़ी प्रसन्न होती है।
चिड़िया भी सोचने लगती है कि "ये सेठ अपने नगर में सबसे बड़ी सेठ है और यह सेठ अपने पुत्र को जब अच्छी अच्छी चीजें खिलाएंगे तो उसके कुछ टुकड़े मिट्टी में गिरेंगे। तब हम भी खाएंगे तो हमको भी खाने को मिलेगा।" चिड़िया यही सोचकर बड़ी खुश होती है।
एक दिन सेठ का लड़का बड़ा होने लग जाता है।
एक शिवरात्रि निकल जाती है, दो शिवरात्रि भी निकल जाती है, तीसरी शिवरात्रि भी निकल जाती है, चौथी शिवरात्रि भी निकल गई, पांचवी शिवरात्रि; जब होने को आती है तब वह चिड़िया बड़ी चिंतित हो जाती है। चिड़िया बड़ी दुखी होती है। चिड़िया सोचने लगती है कि "सेठ का लड़का 5 साल का होने वाला है और वह सेठ और सेठानी अभी तक कोई दान दक्षिणा नहीं करते हैं, शिव मंदिर में नहीं जाते है, किसी को भी दान-दक्षिणा नहीं देते है, कोई भी पुण्य काम नहीं करते है, किसी की सहायता नहीं करते है, पक्षियों को दाना नहीं डालती है, यह सोच कर चिड़िया बड़ी दुःखी होती हैं। चिड़िया सोचने लगती है "यह लोग यदि ऐसे ही रहे इन लोगों ने दान धर्म करना शुरू नहीं किया; तो इनका पुत्र अल्पायु होगा और बहुत जल्द खत्म हो जाएगा। यह सोच कर चिड़िया बड़ी दुखी होती है। बड़ी चिंतित हो जाती है। चिड़िया सोचने लगती है "मैं सेठ और सेठानी को कहूं तो कैसे कहूं? मेरे भाषा कोई समझते नहीं है। मेरे इसारे कोई समझते नहीं है। अब मैं क्या करूं? यही सोचकर चिड़िया बड़ी दुखी हो जाती है।"
तब तक चिड़िया के बच्चे भी बड़े हो जाते हैं। चिड़िया अपने बच्चों से कहती हैं "हे बच्चों! तुम अपना ख्याल रखना। मैं कुछ दिनों के लिए कहीं जा रही हूं। जल्दी ही आ जाऊंगी। तुम अपना ध्यान रखना। मैं जाकर वापस आती हूं।"
तब चिड़िया घोंसले से उड़ान भरकर सीधी उड़ती-उड़ती कैलाश पहुंच जाती है। कैलाश जाकर, मां पार्वती के चरणों में गिर जाती है और मां पार्वती उस चिड़िया को अपने हाथों में उठा लेती है। "चिड़िया पुत्री! तुम्हें क्या परेशानी है? तुमने जो चाहा था वैसा हो गया। सेठ और सेठानी को पुत्र मिल गया है। अब तुम दोबारा से क्यों आई हो। तब चिड़िया मां पार्वती से कहती है कि मैया मैं सेठ और सेठानी को सतमार्ग पर लाने को असमर्थ हो गई हूं। उनको सत्य की मार्ग पर लाने को असक्षम रही। उनको मैं धर्म की कार्यों में नहीं ला सकी। दोनों पति-पत्नी अभी भी वैसे के वैसे ही है। ना ही कोई मंदिर जाता, ना कोई दान-धर्म करता, ना किसी को भिक्षा देता, ना तो किसी भगवान का भजन करता, ना ही किसी का भला करता, दोनों पति-पत्नी वैसे ही है।
तब महादेव कहते है की "हे चिड़िया! उनका पुत्र अल्प आयु होगा।"
तब चिड़िया मां पार्वती के चरणों में पड़ जाती है और सर पटकती है कि "हे मैया! ऐसा नहीं होना चाहिए। उनका पुत्र दीर्घायु होना चाहिए; अल्प आयु नहीं।"
चिड़िया इस बात को अच्छे से जानती थी कि जब पिता से कुछ मांगना हो तो मैया से कहो और मैया के चरणों में पड़ जाओ। अगर वह मैया को राजी कर लेती हैं तो, पिता अपने आप मान जाते हैं। यही सोच कर चिड़िया माता के चरणों में पड़ जाती है, और अपना सर पटक-पटक कर पीटने लगती है।
तब मां पार्वती फिर से भोलेनाथ से अर्जी करती हैं; भोलेनाथ से निवेदन करती है।
"ऐसा नहीं होगा" चिड़िया कहती है "मैया! मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है उनको समझाने के लिए, पर वह लोग तो मेरी भाषा को समझते नहीं। ना ही तो मेरे इशारे को समझते है। अब मैं क्या करूं? कैसे उनको समझाऊं?"
तब चिड़िया कहती हैं कि "अगर आप और भोले बाबा वहां जाए और सेठ और सेठानी को समझाएं।"
तब मां पार्वती और भोले बाबा कहते है, "ठीक है! हम जाएंगे। बहुत जल्द! सेठ और सेठानी के घर जाएंगे।"
फिर चिड़िया वहां से उड़ान भरती है और सीधे अपने घोंसले में वापस आती है।
कुछ दिन बाद महादेव और मां पार्वती साधु का भेस धारण करके, उस सेठ और सेठानी के घर आते है और कहते "है मैया! हमको बड़ी जोर से भूख लगी है। हमको कुछ भोजन खिलाइए। अगर तुम मुझे भोजन नहीं खिलाओगे तो मैं तुम्हें शाप (श्राप) दे दूंगा और तुम बर्बाद हो जाओगे। तब सेठानी कहती है कि "बाबा! तुम मुझे शाप मत देना। हम तुम्हें जरूर भोजन खिलाएंगे। सेठानी ने साधु के भेस में महादेव और मां पार्वती को अपने घर ले जाती है, और अच्छे-अच्छे पकवान बनाकर खिलाती है। उधर सेठ के लड़का इधर-उधर घूमता हैं। कभी रोटी लाते है, तो कभी पूरी, कभी सब्जी लाते हैं; लाकर डालते हैं। कभी मिठाई लाकर डालते हैं।
यह सब देखकर मां पार्वती बड़ी खुश होती है तब मां पार्वती सोचती है "यह महादेव का प्रसाद है इसलिए इतना चंचल है।"
इधर जब सेठानी साधु के भेष पर आई, 'मां पार्वती' और 'महादेव' को भोजन करा देती है। तब महादेव जाने के लिए खड़े होते हैं। तभी सेठ और सेठानी दोनों हाथ जोड़कर उनके सामने आते हैं और कहते है; "हे बाबा! कोई कमी तो नहीं रह गई। अगर रह गई हो तो हमें माफ कर देना, पर शाप ना देना।"
तब महादेव कहते हैं; "सेठ सेठानी तुम दोनों ध्यान से सुनो तुमने पाप तो बहुत किया है, गलतियां करते हो। अगर तुम इस तरह रहे, तो तुम्हारे पुत्र पर घोर संकट आने वाले हैं और वह बहुत जल्द मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा।
तब सेठ और सेठानी साधु के भेष में आए महादेव और मां पार्वती के चरण में पड़ जाते हैं और कहते हैं कि; "बाबा, हमें कोई मार्ग बताइए, कोई रास्ता दिखाइए, इस बुढ़ापे में आकर हमें पुत्र प्राप्ति हुई है। हम खोना नहीं चाहते है।"
तब महादेव कहते हैं; "खड़े हो जाओ! ध्यान से सुनो, अगर आज के बाद तुम्हारे द्वार पर कोई आए तो उसे खाली हाथ नहीं जाने जाना चाहिए। तालाब खुद-ब-खुद भाव परेशान लोगों को पशुओं को सहायता करो, धर्म पूर्ण करो, शिवरात्रि का व्रत करो, ईश्वर का भक्ति करो, भजन करो, महादेव इतना ही कहते हैं।
तब दोनों पति पत्नी चरणों में पड़ जाते हैं; और कहते हैं बाबा हम यही करेंगे।
तब महादेव कहते हैं; "तुम्हारे यहां जो पुत्र खेल रहा है। इधर-उधर घूम रहा है। यह सब तुम्हारे भाग्य में नहीं था। यह सब एक चिड़िया के वजह से हुआ है, जो तुम्हारे यहां से उड़कर कैलाश गई थी, और उसनें विनती करके पुत्र मांगा है। तुम्हारे लिए उस की भक्ति का फल है, जो तुम्हारे घर में नन्ना-सा पुत्र खेल रहा है।"
तब सेठ और सेठानी कहती है; "बाबा, वह चिड़िया कौन-सी थी। तभी चिड़िया वहां आती है और महादेव और पार्वती को प्रणाम करती हैं।
यह दिन शिवरात्रि का दिन था। जब महादेव और मां पार्वती सेठ और सेठानी को दर्शन दिए। तब चिड़िया की शिवरात्रि खत्म होती है। बड़ी धूमधाम से सेठ सेठानी शिवरात्रि का व्रत करते हैं और साथ में चिड़िया भी व्रत करती हैं। उनकी शिवरात्रि सफल हो जाती हैं।
जो लोग महाशिवरात्रि का व्रत करते हैं। उनके ऊपर ऐसे ही महादेव के कृपा रहती है। जैसे ही सेठ सेठानी के ऊपर चिड़िया के ऊपर रही है।

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